Saturday, May 2, 2015

संस्कृत तकनीकी ग्रंथों में अंक और संख्या का प्रयोग-1

संस्कृत में लिखे ज्योतिष और गणित ग्रंथों में प्रायः अंकों और संख्या को इंगित करने के लिए एक विशेष शैली का प्रयोग किया जाता  है | आज की चर्चा इसी पर आधारित है और इसे कई उदाहरणों से समझेंगे |

अधिकतर संस्कृत ग्रंथों में पद्य का प्रयोग किया जाता रहा है, और छंदों में ही लिखा हुआ है | कई प्रकार के संस्कृत छंद उपलब्ध थे तो छंदों को अंकों और संख्याओं को इन्हीं छंदों में पद्य में ही पिरो दिया जाता था | विषय को जानने वाला उनका सही अर्थ, अंकों और संख्याओं को समझ लेता था |

तो दो तरह से ये काम किया जाता था -
1. अक्षरों से अंक-ज्ञान: (कटपयादि परम्परा)- इस परम्परा में अंकों का ज्ञान अक्षरों से किया जाता था | इसके लिए सूत्र जिसका प्रयोग किया जाता है वो है 
"अवर्गे शून्यं कादि नव टादि नव पादि पञ्च याद्यष्टौ नञ शून्यम्"
अर्थात् नीचे की सारिणी देखें और बायीं ओर से दायीं ओर अक्षरों के समूह के लिए अंक याद रखें -
अंक
वर्ण->
0
लृ
1







2







3







4







5







6








7








8








9









अब एक सूत्र और ध्यान रखें 
"अङ्कानाम् वामतो गतिः"
मतलब अंकों की गति (प्रवाह) बायीं ओर से होता है |

तो यदि आप को शब्द बताया 'काम' तो इसका अर्थ हुआ (ऊपर के सारणी से देखें) क =1, म=5 अब दूसरा नियम 'अङ्कानां वामतो गतिः' तो काम =51

इसी प्रकार शब्द बताया 'कमल' तो अर्थ हुआ क=1, म=5,ल=3; कमल=351
यहाँ ध्यान दें कि मात्राओं का कोई महत्व नहीं है, 'काम' और 'कामी' एक ही हैं |
यही 'अङ्कानां वामतो गतिः' का नियम ही है जिससे एकादश (एक+दश) का मतलब 11, द्वादश (द्वा+दश) का मतलब 12, त्रयोविंशति (त्रि+विंशति) 23 |
अब इस पद्धति का सबसे सुन्दर उदाहरण देखें -


गोपीभाग्यमधुव्रात शृङ्गिशोदधिसन्धिग । 
खलजीवितखाताव गलहालारसंधर ॥

इस श्लोक का अर्थ है -

गोपियों के भाग्य, मधु (दानव) को मारने वाले, सींग वाले पशुओं (गौओं) के रखवाले, समुद्र में जाने वाले, दुष्टों का नाश करने वाले, कंधे पर हल रखने वाले और अमृत रखने वाले आप हमारी रक्षा करो |

परन्तु इस श्लोक में कुछ और भी छुपा है जो ऊपर वाली सारणी से निकाला जा सकता है -

गो=3, पी=1, भा=4, ग्य (य)=1, म=5, धु=9, व्रा (र)=2, त=6............

चलते रहें और संख्या लिखते रहें क्या ये संख्या कुछ जानी-पहचानी है ?
3.1415926...... अरे ये तो पाई (PI) का मान है | परन्तु ये 'अङ्कानां वामतो गतिः' को नहीं मानता |

अब यह भी जान लें की यह छंद अनुष्टुप प्रकार का छंद है और यह उसके नियमों का भी पालन करता है | विशिष्टता 1.अनुष्टुप छंद, 2.एक सामान्य अर्थ 2.विशिष्ट अर्थ जिसमें कुछ स्थिर अक्षरों का ही प्रयोग करना है |





यदि ऊपर दिया श्लोक कम पड़ रहा हो तो ये लीजिये माधवाचार्य द्वारा साइन (Trigonometrical Sine) के मानों की सारणी बनाने के लिए एक श्लोक -









श्रेष्ठं नाम वरिष्ठानां हिमाद्रिर्वेदभावनः।
तपनो भानुसूक्तज्ञो मध्यमं विद्धि दोहनं।।
धिगाज्यो नाशनं कष्टं छत्रभोगाशयाम्बिका।
म्रिगाहारो नरेशोऽयं वीरोरनजयोत्सुकः।।
मूलं विशुद्धं नालस्य गानेषु विरला नराः।
अशुद्धिगुप्ताचोरश्रीः शंकुकर्णो नगेश्वरः।।
तनुजो गर्भजो मित्रं श्रीमानत्र सुखी सखे!।
शशी रात्रौ हिमाहारो वेगल्पः पथि सिन्धुरः।।
छायालयो गजो नीलो निर्मलो नास्ति सत्कुले।
रात्रौ दर्पणमभ्राङ्गं नागस्तुङ्गनखो बली।।
धीरो युवा कथालोलः पूज्यो नारीजरैर्भगः।
कन्यागारे नागवल्ली देवो विश्वस्थली भृगुः।।
तत्परादिकलान्तास्तु महाज्या माधवोदिताः।
स्वस्वपूर्वविशुद्धे तु शिष्टास्तत्खण्डमौर्विकाः।।

ये है गृहकार्य हेतु !
फ्यू........अब बाकी अगले अंक में |
-  --  स्व. डॉ. पं. अशोकशर्मात्मजअलंकार